Share on:

जब सुबह सुबह या कुछ जगह शाम को होली जलाई जाती है तब होलिका मैया की जय का जयकारा आम बात है।
होलिका पूजन भी होता है।
गन्ने, गेहूं की बाली आदि भून कर खाए जाने की परंपरा भी है।

क्या यह सम्भव है जिसकी पूजा कर रहे जिसके जयकारे लगा रहे उसी का दहन भी कर रहे!
यह क्या सम्भव है की किसी चिता में(प्रतीक ही सही) भले ही दुनिया का सबसे बुरा आदमी हो उसमें खाने के लिए कुछ भूनने लग जाए!

महिला को जलाए जाने की बात न तो उसके पूजन वाले तर्क से, न ही खेती किसानी से जुड़े लोगों को अपनी फसलों की खुशी में मनाए जाने वाले त्यौहार से सिद्ध होती।

होली किसी महिला को जला कर खुशिया मनाने का त्यौहार नहीं हो सकता। किसी महिला को जलाए जाने की कहानी एक ऐसे उत्सव में जोड़ा जाना जिसे बसंतोत्सव, श्रंगार उत्सव कहा जाता हो में पूरी तरह काल्पनिक दिखाई देती है।

हो सकता है यह कहानी इसी लिए जोड़ी गई हो क्योकि यह त्यौहार प्रकृति के करीब है, सामाजिक है इसलिए ही इसमें पोगा पंथी की गई हो। होली का त्यौहार सामाजिक समरसता और खुशियों से मनता रहना चाहिए। दो चार दिन नहीं पहले की तरह ही महीने महीने भर होली का उत्सव चलता रहे। लेकिन इतने अच्छे त्यौहार को किसी महिला को जला कर मार देने वाली अमानवीय कल्पना से मन को दूर और साफ रखते हुए।


Nishant Rana 
Social thinker, writer and journalist. 
An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *