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Nishant Rana

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पांच पार्टियां मुख्य है कांग्रेस, भाजपा, सपा ,बसपा और लोकदल। पिछले कई सालों से सपा और बसपा ने ही प्रदेश की  राजनीति में मुख्य धमक रखी, पिछले लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा भी राजनैतिक सत्तात्मक लड़ाई में दोबारा दावेदारी ठोक चुकी। लोकदल व कांग्रेस प्रदेश की राजनीति में अस्तित्व बनाये रखने के लिए ही जूझते दिखे। खैर पोस्ट के विषय पर आते है –भारतीय राजनीति में नेतृत्व दो तरीकों से होता आया है एक है सामंती तरीका जिसमें खुद को अवतार बना कर उसे लंबे समय तक भुनाया जा सकता है , अवतार नफरत फैलाकर, हिन्दू रक्षक, मुस्लिम रक्षक, दलित रक्षक , कल्पनाओं में ले जा कर आदि कैसे भी बन सकते है, ऐसा नहीं है कि इतना करने के लिए भी मेहनत नहीं करनी पड़ती बिल्कुल करनी पड़ती है लेकिन इस बात से कोई मतलब नहीं होता की जमीनी समस्याएं क्या है, उन पर काम कैसे करना है । सत्ता पाने और उसे बनाए रखने के लिए बस लोगों को आपके ईश्वर मान लेने तक बरगलाना है।
दूसरा तरीका है जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है। नेतृत्व लोगों के बीच से निकलता हुआ ऊपर तक पहुँचता है, इसमें आप अवतार नहीं होते , बरगलाना आपकी प्राथमिकता नहीं होती, क्षेत्रीय नेताओं के संगठन से शीर्ष नेतृत्व बनता है , अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग समस्याओं पर काम करते हुए लोगों के बीच नेता बनते है , चुनाव जीतकर अपने क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व करते है। प्रदेश स्तर या राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व इस बात पर निर्भर करता है की क्षेत्र स्तर की राजनीति में आप लोगों की समस्याओं पर कितना काम कर रहे; क्षेत्रीय नेताओं को अपने लोगों के लिए काम करने , बात रखने के लिए, आगे बढ़ने कितने मौके दे रहे। क्षेत्रीय नेतृत्व अपने वादों पर असफल तो शीर्ष स्तर पर भी नेतृत्व असफल।भारतीय समाज सामंती मानसिकता वाला है, लंबे समय से अवतारों को गढ़ता रचता आ रहा है, आम जन चाहे कोई सी भी जाति से आता हो उसे राजनीति में भी दो चीजें अवश्य चाहिए एक अवतार पूजने के लिए जो उसके मन मुताबिक बाते बस कह देता हो दूसरा जिससे नफरत की जा सके इतनी नफरत की पूज्य अवतार केवल और केवल दूसरे से नफरत की वजह से भी पूज्य रह जाए तो कोई दिक्कत नहीं। भारतीय राजनीति हमारी सामाजिक मानसिकता से बिलकुल अछूती नहीं रह सकती यदि कोई व्यक्ति अवतार-करण तोड़ने के लिए भी प्रयास कर रहा हो तो देर-सवेर हम उसे भी पूजने लग जायेंगे।
अपने आप को मसीहा बना देने की राजनीति करने में मैं बसपा को दूसरे स्थान पर रखूँगा क्योंकि भाजपा सत्ता में हो न हो उसकी विचारधारा चाहे वह नफरत फैलानी वाली हो, लोगों को बांटने वाली हो, समाज में सामंती व्यवस्था स्थापित करने वाली हो उसकी पूरी टीम समाज में लगातार अपना काम करती रहती है, पार्टी सत्ता में हो न हो वह समाज में लगातार वह अपनी विचारधारा पोषित करती रहती है। जबकि बसपा दलित उत्थान को मुद्दा बना कर अस्तित्व में आयी थी लेकिन बहन जी से अलग इतने सालों बाद भी न तो दलितों की स्थिति में कोई सुधार दिखा न ही दलित नेतृत्व करता कोई क्षेत्रीय नेता। चुनावों से पहले दलित मुद्दे, अन्य समस्याएं कहाँ गायब रहते है ! यह सवाल उठते नहीं है उठते भी है तो जवाब नदारद ही रहते है। मेरा यह मानना है कि सत्ता अपने कामों को पूरा करने के लिए जरुरी हो सकती है लेकिन किसी नेतृत्व या विचार की मज़बूरी नही हो सकती । लेकिन अवतार वाद की राजनीति इतनी प्रबल हो चुकी है कि जिसे पूजते है वह शीर्ष पर बने रहना चाहिए भले ही खुद की स्थिति ज्यों की त्यों रहें। दलित नेतृत्व जो आना चाहिए था जो नेतृत्व सामाजिक आंदोलन रच सकता था , समाज की दिशा तय कर सकता था वह आया ही नहीं। लेकिन जो आया वह सत्ता का सुख पाने के लिए समझौते और सामंती मानसिकता को ही मजबूत करता चला गया।


Nishant Rana

Social thinker, writer and journalist. 

An engineering graduate; devoted to the perpetual process
of learning and exploring through various ventures
implementing his understanding on social, economical,
educational, rural-journalism and local governance.

 

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