Share on:

हमने अब तक का सफर बड़ा अच्छा तय किया है-
हमारे समाज में वर्णव्यवस्था/जातिव्यवस्था/पितृसत्ता  से देश का भला होना होता तो पांच हजार सालों में हो चुका होता। वैश्विक स्तर पर इतने पिछड़े हुए नहीं होते। भोग के लिए पर्यावरण को नष्ट नहीं किए होते। जातिव्यवस्था पूरी तरह एक दूसरे पर सत्ता कैसे कायम रखी जा सके पर आधारित है। जो समाज सत्ता और लालच पर आधारित हो, काल्पनिक कथाओं पर को सच मानता हो , दैवीय कृपा पर आधारित हो उस समाज में कर्म और जीवन मूल्यों के लिए कितनी जगह बचेगी !
जीने के ढंग में वैदिक व्यवस्था को सर्वोत्तम मान लिया। वर्ण व्यवस्था ऐसी बनायीं की आज तक मानसिक विकास थमा हुआ। जात पात के नाम पर मनुष्य को मनुष्य न समझा गया , स्त्रियों और शूद्रों को केवल भोगने के लिए ही पैदा होना बता दिया। इतने कड़े नियम बना दिए गए चलना , खाना पीना साँस लेना ही दूभर हो गया।
ब्राह्मणवाद का मतलब एक खास जाति के लोगो को न समझा जाए । हर वह व्यक्ति चाहे वह वर्णव्यवस्था में देवता माना जाता हो या शूद्र माना जाता हो अगर वह पाखंडो, पूजा पाठ , दैवीय कल्पनाओं को सच मानता हो तब दोनों ही इस शोषणकारी अमानवीय व्यवस्था का भरणपोषण कर रहे। इन बातों में भी कोई अंतर नहीं की आप किसी देवता को पूजते हो, गांधी को पूजते हो या फिर आंबेडकर को पूजते हो।
ऐसे व्यक्तियों से भी मुझे पूरी आपत्ति है जो पूरी ज़िंदगी खुद शोषक वर्ग में जन्मे , दैवीय कर्म काण्डों में लिप्त रहते है, ऐसा समाज का हिस्सा है जो भ्रूण हत्याओं में सबसे आगे रहता हो, जिसमें प्रेम विवाह के नाम पर हत्याएं हो जाती हो वह शोषित वर्ग को गरियाते फिरे कि नफरत क्यों पाल रहे , अम्बेडकर वादी क्यों हो रहे? 
जब तक खुद को इन सब से बाहर नहीं निकाला, जिस व्यवस्था को जी रहे हो उस पर सवाल खड़ा नहीं किया। न ही तुम यह जानते या महसूस करते हो की ये प्रतिक्रियाएं क्यों जन्मी, वह रोजमर्रा की जिंदगी में क्या झेलते है ( झेलना और देखना दोनों में जमीन आसमान का अंतर है) क्यों लोग बिना सोचे समझे शोषक वर्ग की तरह ही बनना चाहते है तब तक आपके सवाल समझ पूरी तरह निर्लज्जता के घेरे में है।
कुछ लोगों यहां से हटे तो जैनी हो गए मोक्ष के नाम पर शरीर को इतने कष्ट दिए की पूछो मत, अहिंसा के नाम पर इतने कट्टर हो गए की अपने शरीर के साथ की जा रही हिंसा ही न दिखी ।
एक व्यक्ति ने आगे आकर जीवन को समझने के लिए तब के सारे तरीकेे अपनाये जब शरीर को कष्ट देकर , तपस्या कर के, भूखा रह कर भी कुछ न हुआ तब जो सामने है उसे देखते हुए, मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझते हुए बुद्ध ने सभी प्रपंचो की पोल पट्टी खोली। जीवन को समझने समझाने की कोशिश की लेकिन हमने उसका भी क्या किया बुद्ध के बाद उस पर भी झंडा लगा कर धर्म बना दिया। 
आज सबका जमाल घोटा चल रहा है, वर्तमान दिखता नहीं इतिहास में घुस कर किसी भविष्य के लिये मार काट मचाये पड़े है किसी को ब्राह्मणवादी व्यवस्था लागू करनी है , कोई संगठन हिंदुत्व की रक्षा के लिए लड़ रहा है , किसी को साम्यवाद चाहिए , कुछ को भौतिकवाद चाहिए भले ही इन सब के लिए वर्तमान में कितनी भी हत्याएँ करनी पड़े , भृष्ट होना पड़े, खुद को कष्ट देना पड़े। अपना विकास हुआ नहीं पहले देश सुधार के तरीके दिमाग में भर लिए जाते है भले ही उस कल्पना के परिणाम कितने भी भयानक हो , ऐसे सुधार अंत आते आते में व्यक्तिगत कुंठाओं को तृप्त करने में ही योगदान देते है।

चलते चलते:-
पूर्वजों ने अपने समय के हिसाब से जो ठीक लगा किया जो सुरक्षा , सत्ता , जीवन को समझने के लिए जो रास्ता दिखा अपना लिया, लेकिन हम किस हिसाब से अपने को विकसित बोलते है जैसे माहौल में पैदा हो गए, जैसा सुनते आये वहीं हमारा अंतिम सत्य हो गया भले ही वह कितना वीभत्स हो , वास्तविकता से कितना भी दूर हो बिना जांचे परखे ही अपना लेना उस पर तर्क वितर्क करते रहने ही विकसित होना होता है क्या भले ही पाँच हजार साल पुरानी जाति प्रथा पर ही गर्व क्यों न कर रहे हो। वास्तविकता यहीं है की वाह्य रूप से हम कितना भी आगे निकल आए हो मानसिक रूप से अपवाद व्यक्तित्वों को छोड़ कर हम दो कदम सही से न चले है। आज भौतिक सुखों को इकठ्ठा करने राह पकड़ रखी है लेकिन उम्र निकल जाती है सुख कमाते कमाते लेकिन वो दिन नहीं आता जिस दिन फुर्सत से उन सुखों का भी भोग कर ले , देख ले की इतना सब चाहिए भी था की नहीं, चाहिए भी था तो किस कीमत पर कभी सोचा की रोज एक जैसा जीवन जीने के लिए, धार्मिक, भौतिक उन्मादों में कितनी झीलों, तालाबों, नदियों की हत्या कर दी, कितने जंगल मिटा दिए , कितने जानवर मिटा दिए, युद्धों में कितने इंसान बलि चढ़ चुके। कल्पना कीजिए की खुद के ही जीवन का घेरा कितना सीमित कर चुके। कल्पना कीजिए उस कल की जिसमें सीमेंट के एक घर की जो कहीं रेगिस्तान में दुनिया की सारी सुविधाएँ लिए बिना पानी , भोजन व अन्य किसी भी प्राकृतिक संपदा के बिना खड़ा है। 
विकास के नाम पर हमनें किस दिन अपना भला किया है, अलग अलग नामों के साथ क्या सब एक जैसे ही नहीं है?

 


Nishant Rana 
Social thinker, writer and journalist. 
An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *