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गांधी केवल सत्याग्रही नहीं थे।
गांधी केवल अहिंसावादी नहीं थे।
गांधी केवल आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं थे।
गांधी केवल चिंतक अथवा दार्शनिक नहीं थे।
गांधी केवल राजनीतिज्ञ नहीं थे।
गांधी केवल ईमानदार नहीं थे।
गांधी केवल अनशन करने वाले व्यक्ति नहीं थे।
गांधी केवल स्वच्छता अभियान चलाने वाले व्यक्ति नहीं थे।
गांधी केवल चरखा कातने वाले व्यक्ति नहीं थे।
गांधी केवल आश्रम में या एक धोती में रहने रहने वाले व्यक्ति नहीं थे।

गांधी का व्यक्तित्व उस समय मीडिया द्वारा प्रचारित की गई कोई अनोखी छवि नहीं था।

गांधी हाथ पर हाथ धरे बैठने वाले व्यक्तियों में से नहीं थेजब जैसी परिस्थिति हुई उस हिसाब से चीजों का चुनाव किया। जरूरत पड़ी तो रणनीतियां भी बदली। अनशन जरूरी हुआ तो अनशन कियाविद्रोह जरूरी हुआ तो लोगों को साथ लेकर विद्रोह भी किया। स्वयं एवं सभी लोगों की चेतना के स्तर पर भी लगे रहेदेश के भविष्य की रणनीतियां भी तय करते रहे।
ये हम है जो केवल द्वारा की गई कोई एक बात या केवल एक मूवमेंट उठाकर आकलन और जजमेंट देते रहते है। गांधी जी के कई मूवमेंट असफल भी रहे लेकिन उनके तरीकेईमानदारीसाफगोई अपनी छाप छोड़ती गई।
अंग्रेज अकेले गांधी से भला क्यों डरने लगते जब सशस्त्र सेनाओं से न डरे। हिंसा का मार्ग अपनाने वाले क्रांतिकारियों से न डरे।
गांधी का दवाब उस समय गांधी के साथ खड़े लाखों व्यक्तियों का दवाब था जो गांधी की रणनीतियों से प्रभावित होकर गांधी के साथ भी था और गलत बातों के विरुद्ध अहिंसात्मक दवाब भी बनाता था।

चलते-चलते –

ओशो जैसे बाजारू लोग लोगों को बेफकूफ़ समझते हुए गांधी के अनशन को लड़की पटाने के लिए अनशन से जोड़कर व्यख्यान देते थे और मज़ाक उड़ाते थे।

अन्ना जैसे लोगों के प्रायोजित नाटक को मीडिया ने अनशन के लिए दूसरा गांधी ही घोषित कर दिया।

आजकल गांधी केवल सफाई अभियान के ब्रांड अम्बेसडर बना दिए गए है।

यह सब लिखने का कारण केवल इतना है कौन व्यक्ति किस काम को किस लिए कर रहा इतना तो विवेक इस्तेमाल हम कर ही सकते है न !

अनशन लड़की पटाने के लिए किया गयाया देश के दंगे रोकने के लिए किया गयाएक नदी को मरने से बचाने के लिए किया गयाइतना तो हम देख ही सकते है कि कौन-सा व्यक्ति क्या कर रहा?

पिछले कुछ दिनों से ट्रेंड निकला हुआ है कितनी भी मार्मिकसंवेदनशील मनमस्तिष्क झकझोर देने वाली घटना हुई हो उसमें हम आप कितने दोषी है के बजाय उस घटना को कुछ लोगों द्वारा गांधी को गरियाने का मौका बना लिया जाता है।
हर व्यक्ति गांधी नहीं हो सकता लेकिन गांधी के प्रयोगों में से कोई एक प्रयोग किसी सही बात के लिए किए जाने उसके असफल हो जाने पर भी वह प्रयोग या गांधी तो दोषी नहीं हो गए।

(अपने ही देश में अपनी ही सरकारों का अपने ही लोगों की जायज़ मांगों पर क्या रवैया हो गया है यह बाद की बात है लेकिन यह तो मान ही लेना चाहिए कि लोगों में ही सही बात और सही लोग जांचने जितनी चेतना भी मर ही चुकी है)

शायद इसी वजह से जीडी अग्रवाल जी भले ही उतने लोग साथ न जोड़ सके हो जो शासन प्रशासन पर दवाब बना सकते। लेकिन यह उनकी साफ़ नियत और दृढ़ निश्चय ही था कि अंत समय तक भी वह अपने लक्ष्यकर्तव्य समस्त जनकल्याण के प्रति बिना विचलित हुए डटे रहें।
बेहतर है उनके विरोध या मांग तरीके को गरियाने के बजाए खुद से भी कुछ सवाल पूछ ले।

 

 


Nishant Rana 
Social thinker, writer and journalist. 
An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 

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